मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

भ्रमरगीतसार परिचय


भ्रमरगीतसार परिचय


हिन्दी काव्यधारा में सगुण भक्ति परंपरा में कृष्णभक्ति शाखा में सूरदासजी सूर्य के समान दैदिप्तमान हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरदासजी की भक्ति और श्रीकृष्ण-कीर्तन की तन्मयता के बारे में उचित ही लिखा है – ‘आचार्यों की छाप लगी हुई आठ वीणाएं श्रीकृष्ण की प्रेमलीला का कीर्तन करने उठीं जिनमें सबसे उंची, सुरीली और मधुर झनकार अंधे कवि सूरदासजी की वीणा की थी।’
 
भागवत की प्रेरणा से सूरदासजी ने सूरसागर ग्रंथ की रचना की है। इसमें भी भ्रमरगीत-सार प्रसंग द्वारा सूरदासजी ने अपनी अनन्य श्रीकृष्ण प्रीति को गोपियों की उपालंभ स्थिति द्वारा अभिव्यक्त किया है -
मुख्य रूप से सूरदासजी के पदों को हम तीन प्रकार से बांट सकते हैं -
1. विनय के पद (भगवद् विषयक रति)
2. बाल लीला के पद (वात्सल्य रस वाले)
3. गोपियों के प्रेम-संबंधी पद (दाम्पत्य रति वाले)
1. विनय के पद :
श्रीकृष्ण भक्ति में डूबे सूर ने सूरसागर मे तुलसीदास की भांति विनय के पद भी लिखे हैं। गीताप्रेस-गोरखपुर द्वारा संपादित संग्रह ‘सूर-विनय-पत्रिका’ में 309 ऐसे विनय के पद संग्रहीत हैं जिनमें सूरदासजी के वैराग्य, संसार की अनित्यता, विनय प्रबोध एवं चेतावनी के सुंदर पदों का संग्रह है। विनय के पदों का सिरमौर पद यह है जिसमें सूरदासजी की कृष्ण-चरित्र में कितनी श्रद्धा-भक्ति है, उसका परिचय मिलता है -
 
चरन-कमल बंदो हरि-राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे, अंधे को सब कुछ दरसाई।
बहिरो सुनै, मूक पुनि बोले, रंक चलै सिर छत्र धराई।
सूरदासजी स्वामी करूणामय बार-बार बंदौं तिहि पाई।
(सूर, विनय-पत्रिका पद-1)
 
सूरदासजी श्रीकृष्ण की भक्त वत्सलता के बारे में बताते हैं – आप जगत के पिता होने पर भी अपने भक्तों की धृष्टता सह लेते हैं -
 
वासुदेव की बड़ी बड़ाई।
जगत-पिता, जगदीश, जगत-गुरू
निज भक्तन की सहत ढिठाई।
बिनु दीन्हें ही देत सूर-प्रभु
ऐसे हैं जदुनाथ गुसाई॥
(सूर, विनय-पत्रिका, पद 4)
 
सूरदासजी अपने आराध्य की छवि को बिना पलक गिरते देखते रहना चाहते हैं। मन को नंदनंदन का ध्यान करने को कहते हैं कि हे मन! विषय-रस का पान नहीं करना है, जैसे -
 
करि मन, नंदनंदन-ध्यान।
सेव चरन सरोज सीतल, तजि विषय-रस पान॥
सूर श्री गोपाल की छवि, दृष्टि भरि-भरि लेहु।
प्रानपति की निरखि शोभा, पलक परन न देहुं॥
(सूर, विनय-पत्रिका, पद 307)
 
बाल-लीला के पद :
कृष्ण जन्म की आनंद बधाई से ही बाल-लीला का प्रारंभ होता है। भागवत कथा के अनुसार बकी (पूतना) उद्धार से यमलार्जुन उद्धार तक में कृष्ण का गोकुल जीवन और वत्सासुर तथा बकासुर उद्धार से प्रलंबासुर उद्धार एवं गोपों का दावानल से रक्षण तक की कथा वृंदावन बिहारी की बाल-लीला में ले सकते हैं।
सूरदासजी ने श्रीकृष्ण की बाल-लीला से संबंधित अनेक पद लिखे हैं। बालकों की अंत:प्रकृति में भी प्रवेश करके बाल्य-भावों की सुंदर-सुंदर स्वाभाविक व्यंजना की है। बाल-चेष्टा के स्वाभाविक मनोहर चित्रों का जितना भंडार सूरसागर में भरा है उतना और कहीं नहीं। जैसे कृष्ण बाल सहज भाव से जशोदा मैया से पूछते हैं -
मैया कबहुं बढ़ेगी चोटी?
किती बार मोहि दूध पियत भई यह अजहूं है छोटी।
(भ्रमरगीत-सार, पृ.16)
 
श्रीकृष्ण की माखन मंडित मूर्ति और रेणु मंडित तन तथा घुटरून चलने की स्थिति का वर्णन सूर सुंदर ढंग से करते हैं -
 
शोभित कर नवनीत लिए।
घुटरुअन चलत, रेनु तन मंडित, मुख दधि लेप किये।
(भ्रमरगीत-सार, पृ.16)
 
3. गोपियों के प्रेम संबंधी पद :
श्रीमदभागवत में दशम स्कंध के अंतर्गत प्रख्यात पांच गीतों की रचना वेद व्यास की अमर उपलब्धियां हैं – 1. वेणुगीत 2.गोपीगीत 3. युगलगीत 4. भ्रमरगीत और 5. महिषीगीत। 11 वें स्कंध में छठा गीत भिक्षुगीत भी मिलता है।
भक्ति की दृष्टि से गोपीगीत और उद्धवगोपी के संवाद स्वरूप भ्रमरगीत का अनन्य मूल्य है। सूरदासजी ने भी भागवत की प्रेरणा से भ्रमरगीत प्रसंग को सूरसागर में लिखकर अपनी कृष्ण भक्ति को चरितार्थ किया है। गोपियों के प्रेम संबंधी पद भ्रमरगीत प्रसंग में अधिक हैं। वृंदावन के सुखमय जीवन में गोपियों के प्रेम का उदय होता है। श्रीकृष्ण के सौंदर्य और मनोहर चेष्टाओं को देखकर गोपियां मुग्ध होती हैं और कृष्ण की कौमार्यावस्था की स्वाभाविक चपलतावश उनकी छेड़छाड़ प्रारंभ करती हैं। सूर ने ऐसे प्रेम-व्यापार का स्वाभाविक प्रारंभ भी दिखाया है। सूर के कृष्ण और गोपियां मुक्त और स्वछंद तथा उनका जीवन सहज और स्वाभाविक है। कृष्ण बाल्य काल से ही गोपियों के साथ है। सुंदरता, चपलता में वे अद्वितीय थे। अत: गोपियों के प्रेम का क्रमश: विकास दो प्राकृतिक शक्तियों के प्रभाव से होने से बहुत स्वाभाविक प्रतीत होता है। श्रीकृष्ण-राधा का प्रथम मिलन सूरदासजी बाल-सहज निर्दोषता से प्रस्तुत करते हैं -
 
बूझत श्याम, कौन तू गौरी।
कहां रहति, काकी तू बेटी? देखी नहिं कहुं ब्रज खोरी।
काहे को हम ब्रज तनु आवति, खेलति रहति आपनी पौरी।
सुनत रहति नंद करि झोटा, करत रहत माखन दधि चोरी।
तुमरो कहा चारी लेंहे हम, खेलन चलो संग मिलि जोरी।
सूरदासजी प्रभु रसिक-सिरोमनि बातन भुरई राधिका भोरी
(भ्रमरगीत-सार, पृ.18)
 
श्रीकृष्ण के मथुरा जाने से समग्र ब्रज-प्रांत का जीवन दु:खमय हो गया, सबसे अधिक दयनीय दशा गोपियों की होती है। सूर ने भ्रमरगीत प्रसंग द्वारा गोपियों की विप्रलंभ-श्रृंगार की ऐसी दशा का विस्तार से वर्णन किया है। उद्धव-उपदेश से गोपियों की हालत और दु:खमय बनती है। वे उपालंभ द्वारा कृष्ण-उद्धव को खरी-खोटी सुनाकर अपनी कृष्ण-भक्ति सिद्ध करती हैं -
 
हम तो नंदघोस की बासी।
नाम गोपाल, जाति कुल गोपहि,
गोप-गोपाल दया की।
गिरवरधारी, गोधनचारी, वृंदावन -अभिलाषी।
राजानंद जशोदा रानी, जलधि नदी जमुना-सी।
प्रान हमारे परम मनोहर कमलनयन सुखदासी।
सूरदासजी प्रभु कहों कहां लौ अष्ट महासिधि रासी।
 
यहां गोकुल का जीवन और श्रीकृष्ण की भक्ति में ही गोपियां अपने जीवन की धन्यता बताती हैं, नहीं कि अष्ट महासिद्धि की। उद्धव की निरर्थक ज्ञान वार्ता की गोपियां हंसी उड़ाकर मूल सेठ (श्रीकृष्ण) के मिलन की मुंहमांगी कीमत देना चाहती हैं। जैसे -
 
आयो घोष बड़ो व्यापारी
लादि खेप गुन ज्ञान-जोग की ब्रज में आन उतारी।
 
गोपियां स्त्री-सहजर् ईष्या से ‘कुब्जानाथ’ कहकर कृष्ण को उपालंभ देती हैं -
काहे को गोपीनाथ कहावत?
जो पै मधुकर कहत हमारे गोकुल काहे न आवत?
कहन सुनन को हम हैं उधो सूर अनत बिरमावत।
(भ्रमरगीत-सार, पद 45)
 
यहां ‘मधुकर’ शब्द में तीनों शक्तियां मौजूद हैं। जिसका अभिधा में भौरा, लक्षणा में उद्धव और व्यंजना में कृष्ण अर्थ सूर ने दिया है। गोपियां हरिकथा की प्यासी हैं। उद्धव से विनती करती हैं -
 
हम को हरि की कथा सुनाव।
अपनी ज्ञानकथा हो उधो! मथुरा ही ले जाव।
 
उद्धव द्वारा श्याम-चिटठी से जो गोपियाेंं की दशा होती है उसका सूर ने अद्भुत कौशल से वर्णन किया है -
निरखत अंक श्याम सुंदर के,
बार-बार लावति छाती।
प्राननाथ तुम कब लौं मिलोगे सूरदासजी प्रभु बाल संघाती।
‘अंक श्याम’ में श्लेष प्रयोग हुआ है। एक अर्थ अक्षर काला और दूसरा गोप-कृष्ण अर्थ व्यंजित हुआ है। इस प्रकार सूर के पदों में कृष्ण भक्ति का अनन्य और आकर्षण रूप श्रृंगार और वात्सल्य रस द्वारा प्रस्तुत हुआ है। वे श्रीकृष्ण की कृपा को ही जीवनाश्रम मानते थे।
 
भ्रमर गीत में सूरदासजी ने उन पदों को समाहित किया है जिनमें मथुरा से कृष्ण द्वारा उद्धव को ब्रज संदेस लेकर भेजा जाता है और उद्धव जो हैं योग और ब्रह्म के ज्ञाता हैं उनका प्रेम से दूर दूर का कोई सरोकार नहीं है। जब गोपियाँ व्याकुल होकर उद्धव से कृष्ण के बारे में बात करती हैं और उनके बारे में जानने को उत्सुक होती हैं तो वे निराकार ब्रह्म और योग की बातें करने लगते हैं तो खीजी हुई गोपियाँ उन्हें काले भँवरे की उपमा देती हैं। बस इन्हीं करीब 100 से अधिक पदों का संकलन भ्रमरगीत या उद्धव-संदेश कहलाया जाता है।
 
कृष्ण जब गुरु संदीपन के यहाँ ज्ञानार्जन के लिये गए थे तब उन्हें ब्रज की याद सताती थी। वहाँ उनका एक ही मित्र था उद्धव, वह सदैव रीति-नीति की, निगुर्ण ब्रह्म और योग की बातें करता था। तो उन्हें चिन्ता हुई कि यह संसार मात्र विरक्तियुक्त निगुर्ण ब्रह्म से तो चलेगा नहीं, इसके लिये विरह और प्रेम की भी आवश्यकता है। और अपने इस मित्र से वे उकताने लगे थे कि यह सदैव कहता है, कौन माता, कौन पिता, कौन सखा, कौन बंधु। वे सोचते इसका सत्य कितना अपूर्ण और भ्रामक है। भला कहाँ यशोदा और नंद जैसे माता-पिता होने का सुख और राधा के साथ बीते पलों का आनंद। और तीनों लोकों में ब्रज के गोप-गोपियों के साथ मिलकर खेलने जैसा सुख कहाँ? ऐसा नहीं है कि द्वारा उद्धव को ब्रज संदेस लेकर भेजते समय कृष्ण संशय में न थे, वे स्व्यं सोच रहे थे यह कैसे संदेस ले जाएगा जो कि प्रेम का मर्म ही नहीं समझता, कोरा ब्रर्ह्मज्ञान झाडता है।
 
तबहि उपंगसुत आई गए।
सखा सखा कछु अंतर नाहिं, भरि भरि अंक लए।।
अति सुन्दर तन स्याम सरीखो, देखत हरि पछताने ।
ऐसे कैं वैसी बुधी होती, ब्रज पठऊं मन आने।।
या आगैं रस कथा प्रकासौं, जोग कथा प्रकटाऊं।
सूर ज्ञान याकौ दृढ क़रिके, जुवतिन्ह पास पठाऊं।।
 
तभी उपंग के पुत्र उद्धव आ जाते हैं। कृष्ण उन्हें गले लगाते हैं।
 
दोनों सखाओं में खास अन्तर नहीं। उद्धव का रंग-रूप कृष्ण के समान ही है। पर कृष्ण उन्हें देख कर पछताते हैं कि इस मेरे समान रूपवान युवक के पास काश, प्रेमपूर्ण बुध्दि भी होती। तब कृष्ण मन बनाते हैं कि क्यों न उद्धव को ब्रज संदेस लेकर भेजा जाए, संदेस भी पहुँच जाएगा और इसे प्रेम का पाठ गोपियाँ भली भाँति पढा देंगी। तब यह जान सकेगा प्रेम का मर्म।
 
उधर उद्धव सोचते हैं कि वे विरह में जल रही गोपियों को निगुर्ण ब्रह्म के प्रेम की शिक्षा दे कर उन्हें इस सांसारिक प्रेम से की पीडा मुक्ति से मुक्ति दिला देंगे। कृष्ण मन ही मन मुस्का कर उन्हें अपना पत्र थमाते हैं कि देखते हैं कि कौन किसे क्या सिखा कर आता है।
 
 
उद्धव पत्र गोपियों को दे देते हैं और कहते हैं कि कृष्ण ने कहा है कि -
 
सुनौ गोपी हरि कौ संदेस।
करि समाधि अंतर गति ध्यावहु, यह उनको उपदेस।।
वै अविगत अविनासी पूरन, सब घट रहे समाई।
तत्वज्ञान बिनु मुक्ति नहीं, वेद पुराननि गाई।।
सगुन रूप तजि निरगुन ध्यावहु, इक चित्त एक मन लाई।
वह उपाई करि बिरह तरौ तुम, मिले ब्रह्म तब आई।।
दुसह संदेस सुन माधौ को, गोपि जन बिलखानी।
सूर बिरह की कौन चलावै, बूडतिं मनु बिन पानी।।
 
हे गोपियों, हरि का संदेस सुनो। उनका यही उपदेस है कि समाधि लगा कर अपने मन में निगुर्ण निराकार ब्रह्म का ध्यान करो। यह अज्ञेय, अविनाशी पूर्ण सबके मन में बसा है। वेद पुराण भी यही कहते हैं कि तत्वज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसी उपाय से तुम विरह की पीडा से छुटकारा पा सकोगी। अपने कृष्ण के सगुण रूप को छोड उनके ब्रह्म निराकार रूप की अराधना करो। उद्धव के मुख से अपने प्रिय का उपदेश सुन प्रेममार्गी गोपियाँ व्यथित हो जाती हैं। अब विरह की क्या बात वे तो बिन पानी पीडा के अथाह सागर डूब गईं।
 
तभी एक भ्रमर वहाँ आता है तो बस जली-भुनी गोपियों को मौका मिल जाता है और वह उद्धव पर काला भ्रमर कह कर खूब कटाक्ष करती हैं।
 
रहु रे मधुकर मधु मतवारे।
कौन काज या निरगुन सौं, चिरजीवहू कान्ह हमारे।।
लोटत पीत पराग कीच में, बीच न अंग सम्हारै।
भारम्बार सरक मदिरा की, अपरस रटत उघारे।।
तुम जानत हो वैसी ग्वारिनी, जैसे कुसुम तिहारे।
घरी पहर सबहिनी बिरनावत, जैसे आवत कारे।।
सुंदर बदन, कमल-दल लोचन, जसुमति नंद दुलारे।
तन-मन सूर अरपि रहीं स्यामहि, का पै लेहिं उधारै।।
 
गोपियाँ भ्रमर के बहाने उद्धव को सुना-सुना कर कहती र्हैं हे भंवरे। तुम अपने मधु पीने में व्यस्त रहो, हमें भी मस्त रहने दो। तुम्हारे इस निरगुण से हमारा क्या लेना-देना। हमारे तो सगुण साकार कान्हा चिरंजीवी रहें। तुम स्वयं तो पराग में लोट लोट कर ऐसे बेसुध हो जाते हो कि अपने शरीर की सुध नहीं रहती और इतना मधुरस पी लेते हो कि सनक कर रस के विरुध्द ही बातें करने लगते हो। हम तुम्हारे जैसी नहीं हैं कि तुम्हारी तरह फूल-फूल पर बहकें, हमारा तो एक ही है कान्हा जो सुन्दर मुख वाला, नीलकमल से नयन वाला यशोदा का दुलारा है। हमने तो उन्हीं पर तन-मन वार दिया है अब किसी निरगुण पर वारने के लिये तन-मन किससे उधार लें?
 
उधौ जोग सिखावनि आए।
सृंगी भस्म अथारी मुद्रा, दै ब्रजनाथ पठाए।।
जो पै जोग लिख्यौ गोपिन कौ, कत रस रास खिलाए।
तब ही क्यों न ज्ञान उपदेस्यौ, अधर सुधारस लाए।।
मुरली शब्द सुनत बन गवनिं, सुत पतिगृह बिसराए।
सूरदासजी संग छांडि स्याम कौ, हमहिं भये पछताए।।
 
गोपियाँ कहती र्हैं हे सखि! आओ, देखो ये श्याम सुन्दर के सखा उद्धव हमें योग सिखाने आए हैं। स्वयं ब्रजनाथ ने इन्हें श्रृंगी, भस्म, अथारी और मुद्रा देकर भेजा है। हमें तो खेद है कि जब श्याम को इन्हें भेजना ही था तो, हमें अदभुत रास का रसमय आनंद क्यों दिया था? जब वे हमें अपने अथरों का रस पिला रहे थे तब ये ज्ञान और योग की बातें कहाँ गईं थीं? तब हम श्री कृष्ण की मुरली के स्वरों में सुधबुध खो कर अपने बच्चों और पति के घर को भुला दिया करती थीं। श्याम का साथ छोडना हमारे भाग्य में था ही तो हमने उनसे प्रेम ही क्यों किया अब हम पछताती हैं।
 
मधुबनी लोगि को पतियाई।
मुख औरै अंतरगति औरै, पतियाँ लिख पठवत जु बनाई।।
ज्यौं कोयल सुत काग जियावै, भाव भगति भोजन जु खवाई।
कुहुकि कुहुकि आएं बसंत रितु, अंत मिलै अपने कुल जाई।।
ज्यौं मधुकर अम्बुजरस चाख्यौ, बहुरि न बूझे बातें आई।
सूर जहँ लगि स्याम गात हैं, तिनसौं कीजै कहा सगाई।।
 
कोई गोपी उद्धव पर व्यंग्य करती है।मथुरा के लोगों का कौन विश्वास करे? उनके तो मुख में कुछ और मन में कुछ और है। तभी तो एक ओर हमें स्नेहिल पत्र लिख कर बना रहे हैं दूसरी ओर उद्धव को जोग के संदेस लेके भेज रहे हैं। जिस तरह से कोयल के बच्चे को कौआ प्रेमभाव से भोजन करा के पालता है और बसंत रितु आने पर जब कोयलें कूकती हैं तब वह भी अपनी बिरादरी में जा मिलता है और कूकने लगता है। जिस प्रकार भंवरा कमल के पराग को चखने के बाद उसे पूछता तक नहीं। ये सारे काले शरीर वाले एक से हैं, इनसे सम्बंध बनाने से क्या लाभ?
 
निरगुन कौन देस को वासी।
मधुकर कहि समुझाई सौंह दै, बूझतिं सांचि न हांसी।।
को है जनक, कौन है जननि, कौन नारि कौन दासी।
कैसे बरन भेष है कैसो, किहिं रस मैं अभिलाषी।।
पावैगो पुनि कियौ आपनो, जो रे करेगौ गांसी।
सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरो, सूर सबै मति नासी।।
 
अब गोपियों ने तर्क किर्या हाँ तो उद्धव यह बताओ कि तुम्हारा यह निर्गुण किस देश का रहने वाला है? सच सौगंध देकर पूछते हैं, हंसी की बात नहीं है। इसके माता-पिता, नारी-दासी आखिर कौन हैं? कैसा है इस निरगुण का रंग-रूप और भेष? किस रस में उसकी रुचि है? यदि तुमने हमसे छल किया तो तुम पाप और दंड के भागी होगे। सूरदासजी कहते हैं कि गोपियों के इस तर्क के आगे उद्धव की बुध्दि कुंद हो गई। और वे चुप हो गए। लेकिन गोपियों के व्यंग्य खत्म न हुए वे कहती रहीं -
 
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहे।
मूरि के पातिन के बदलै, कौ मुक्ताहल देहै।।
यह ब्यौपार तुम्हारो उधौ, ऐसे ही धरयौ रेहै।
जिन पें तैं लै आए उधौ, तिनहीं के पेट समैंहै।।
दाख छांडि के कटुक निम्बौरी, कौ अपने मुख देहै।
गुन करि मोहि सूर साँवरे, कौ निरगुन निरवेहै।।
 
हे उद्धव ये तुम्हारी जोग की ठगविद्या, यहाँ ब्रज में नहीं बिकने की। भला मूली के पत्तों के बदले माणक मोती तुम्हें कौन देगा? यह तुम्हारा व्यापार ऐसे ही धरा रह जाएगा। जहाँ से ये जोग की विद्या लाए हो उन्हें ही वापस सिखा दो, यह उन्हीं के लिये उचित है। यहाँ तो कोई ऐसा बेवकूफ नहीं कि किशमिश छोड क़र कडवी निंबौली खाए! हमने तो कृष्ण पर मोहित होकर प्रेम किया है अब तुम्हारे इस निरगुण का निर्वाह हमारे बस का नहीं।
 
काहे को रोकत मारग सूधो।
सुनहु मधुप निरगुन कंटक तै, राजपंथ क्यौं रूंथौ।।
कै तुम सिखि पठए हो कुब्जा, कह्यो स्यामघनहूं धौं।
वेद-पुरान सुमृति सब ढूंढों, जुवतिनी जोग कहूँ धौं।।
ताको कहां परैंखों की जे, जाने छाछ न दूधौ।
सूर मूर अक्रूर गयौ लै, ब्याज निवैरत उधौ।।
 
गोपियां चिढ क़र पूछती हैं कि कहीं तुम्हें कुबजा ने तो नहीं भेजा? जो तुम स्नेह का सीधा साधा रास्ता रोक रहे हो। और राजमार्ग को निगुर्ण के कांटे से अवरुध्द कर रहे हो! वेद-पुरान, स्मृति आदि ग्रंथ सब छान मारो क्या कहीं भी युवतियों के जोग लेने की बात कही गई है? तुम जरूर कुब्जा के भेजे हुए हो। अब उसे क्या कहें जिसे दूध और छाछ में ही अंतर न पता हो। सूरदासजी कहते हैं कि मूल तो अक्रूर जी ले गए अब क्या गोपियों से ब्याज लेने उद्धव आए हैं?
 
उधौ मन ना भए दस बीस।
एक हुतौ सौ गयौ स्याम संग, को आराधे ईस।।
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस।
तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस।
सूर हमारै नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस।।
 
अब थक हार कर गोपियाँ व्यंग्य करना बंद कर उद्धव को अपने तन मन की दशा कहती हैं। उद्धव हतप्रभ हैं, भक्ति के इस अद्भुत स्वरूप से। हे उद्धव हमारे मन दस बीस तो हैं नहीं, एक था वह भी श्याम के साथ चला गया। अब किस मन से ईश्वर की अराधना करें? उनके बिना हमारी इंद्रियां शिथिल हैं, शरीर मानो बिना सिर का हो गया है, बस उनके दरशन की क्षीण सी आशा हमें करोडों वर्ष जीवित रखेगी। तुम तो कान्ह के सखा हो, योग के पूर्ण ज्ञाता हो। तुम कृष्ण के बिना भी योग के सहारे अपना उध्दार कर लोगे। हमारा तो नंद कुमार कृष्ण के सिवा कोई ईश्वर नहीं है।
 
गोपी उद्धव संवाद के ऐसे कई कई पद हैं जो कटाक्षों, विरह दशाओं, राधा के विरह और निरगुण का परिहास और तर्क-कुतर्क व्यक्त करते हैं। सभी एक से एक उत्तम हैं पर यहाँ सीमा है लेख की।
 
अंतत: गोपियाँ राधा के विरह की दशा बताती हैं, ब्रज के हाल बताती हैं। अंतत: उद्धव का निरगुण गोपियों के प्रेममय सगुण पर हावी हो जाता है और उद्धव कहते हैं -
 
अब अति चकितवंत मन मेरौ।
आयौ हो निरगुण उपदेसन, भयौ सगुन को चैरौ।।
जो मैं ज्ञान गह्यौ गीत को, तुमहिं न परस्यौं नेरौ।
अति अज्ञान कछु कहत न आवै, दूत भयौ हरि कैरौ।।
निज जन जानि-मानि जतननि तुम, कीन्हो नेह घनेरौ।
सूर मधुप उठि चले मधुपुरी, बोरि जग को बेरौ।।
 
कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम को देख कर उद्धव भाव विभोर होकर कहते र्हैं मेरा मन आश्चर्यचकित है कि मैं आया तो निर्गुण ब्रह्म का उपदेश लेकर था और प्रेममय सगुण का उपासक बन कर जा रहा हूँ। मैं तुम्हें गीता का उपदेश देता रहा, जो तुम्हें छू तक न गया। अपनी अज्ञानता पर लज्जित हूँ कि किसे उपदेश देता रहा जो स्वयं लीलामय हैं। अब समझा कि हरि ने मुझे यहाँ मेरी अज्ञानता का अंत करने भेजा था। तुम लोगों ने मुझे जो स्नेह दिया उसका आभारी हूँ। सूरदासजी कहते हैं कि उद्धव अपने योग के बेडे क़ो गोपियों के प्रेम सागर में डुबो के, स्वयं प्रेममार्ग अपना मथुरा लौट गए।
 

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