गुरुवार, 3 मार्च 2011

कबीरदास


"कबीरदासभक्ति आन्दोलन के एक उच्च कोटि के कवि,समाजसुधारक एवं प्रवर्तकमाने जाते है इनका जन्म सं.१४५५ में हुआ था -
चौदह सौ पचपन साल गए चंद्रवार एक ठाठ 
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी प्रगत भए 
नीरू एवं नीमा नामक जुलाहों ने इनका पालन-पोषण किया था स्वामी रामानंद ,इनकेगुरु थे कबीर ने कहा हैकाशी में हम प्रगत भये,रामानंद चेताये  " कबीर की स्त्री कानाम लोई था कमाल और कमाली ,इनकी संताने थी कबीर ने जुलाहे का व्यसायअपनाया थाइनका निधन १५७५ में मगहर में हुआ था
बीजक कबीर की प्रमाणिक रचना मानी जाती है इसमे कबीर की वाणी का,उनके शिष्योंद्वारा किया गया संकलन है बीजक के तीन भाग -साखी,सबद और रमैनी है  इसमेसाखी महत्वपूर्ण मानी जाती है
महात्मा कबीर के समय में सारा समाज अस्त-व्यस्त था उनका युग सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से सक्रांति कालथा,समाज टूटा था हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मान्धता में जकड़े एक दूसरे के प्रति विद्वेष की भावना से ग्रसित थे इसकेकारण दोनों की सम्प्रदायों में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई थी कबीर इस धर्मान्धता से क्षुब्ध थे कबीर ने सामाजिक,धार्मिक क्षेत्र में व्याप्त कुरीतियो और आडम्बरों को भली-भाँति समझा तथा उसे दूर का एक नैतिक समाज के गठन काआह्वान किया कबीर ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते थे,जिसमे  जाती की बाध्यता हो और  ही धर्मान्धता कीजकड़न हो कबीर का समाजसुधारक रूप सामाजिक ,धार्मिक,आर्थिक एवं नैतिक क्षेत्रों में देखा जा सकता है कबीरवर्ण,जाती और धर्म को नही मानते थे कबीर को योगी ,साधु-संन्यासियो,मुनियों एवं पंडितों का आडम्बर कभी स्वीकार नहीहुआ इसीलिए वेशधारी-मिथ्याम्बरी लोगों का विरोध कर इनके व्रत-उपवास और पूजा -पाठ पर व्यंग किया है ब्राह्मणउच्च कुल में जन्म लेने मात्र से अपने को उच्च मानता था,चाहे उसकी दिनचर्या वैश्य की या शुद्र की ही क्यों  हो ,इसीवर्ण-व्यवस्था को कबीर ने बदलने का प्रयास किया
पंडित भूले पढि गुनि वेदा  आप अपनपौ जान  भेदा  
अति गुन गरब करें अधिकाई  अधिकै गरदि  होइ भुलाई  
हिंदू समाज की ही यह दशा  थी,हिन्दुओं की भाँति इस्लाम के ठेकेदारों ने भी अपने समाज में मिथ्या आचार-विचारों एवंआडम्बरों को प्रश्रय दे रखा था मुल्ला की झूठी इबारत और नमाज पढने के उपरांत गो-हत्या करना कबीर से सहा  गया-
"दिन भर रोजा रहत है,रात हनत है गाय" कहकर रोजा का मजाक उडाया।
मुसलमान के पीर औलिया मुर्गा-मुर्गी खायी"
वास्तव में कबीर के प्रेरणा किसी व्यक्ति को सुधारने के लिए नही है,बल्कि दिशाविहीन समाज को दिशा देने के लिए है वेमदांध लोगों को समझाते है-
"निर्बल को  सताइए जाकी मोटी हाय 
मुई खाल की सांस सों सार भसम है जाय   "
कबीर ने किसी मतवाद या प्रवर्तन नही किया। मानव जीवन के लिए उन्होंने जो कल्याणकारी मार्ग समझा ,अपने ज्ञान और अनुभवों के आधार पर जिसे उपयुक्त पाया उसका प्रवर्तन किया। कबीर मात्र एक कवि ही नही थे,बल्कि एक युग-पुरूष की श्रेणी में भी आते है। भक्तिकाल में ही नही,सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में कबीर जैसी प्रतिभा और साहस वाला कोई कवि दूसरा पैदा नही हुआ। उन्होंने भक्तिकाल का एकान्तिक आनंद जितना अपनाया है,उससे भी अधिक सामाजिक परिष्कार का दायित्व निर्वाह किया है। कबीर ने एक भावुक रचनाकार की तरह परमात्मा ,आत्मा ,माया कबीर जगत के विषय में चिंतन किया है।उनके इस चिंतन को दार्शनिक रहस्यवाद की कोटि में रखा जा सकता है। कबीर कोरे दार्शनिक नही है। वे मूलतः भक्त है । इसीलिए तर्कपूर्ण चिंतन -मनन के प्रति उनकी रुझान कम ही रहती है। कबीर सारी चिंता को छोड़ कर केवल हरिनाम की चिंता करते है। राम के बिना जो कुछ भी उन्हें दिखाई देता है,वह सब काल का पाश है। कबीर व्यक्तिगत साधना के साधक एवं प्रचारक थे,परन्तु उनका अपना व्यक्तित्व भी तो समाज सुधार की लहर की उपज था। अतःकबीर एक उच्चकोटि के समाज-सुधारक एवं कवि थे।

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